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Sunday, January 22, 2012

इन लकीरों को ज़मीन ही पे रहने दो दिलों पे मत उतारो







इन लकीरों को ज़मीन ही पे रहने दो दिलों पे मत उतारो

दिखाई देते हैं दूर तक अब भी साए कोई
मगर बुलाने से वक़्त लौटे न आये कोई
चलो न
फिर से बिछायें दरिया
बजायें ढोलक
लगाके मेहँदी
सुरीले टप्पे सुनायें कोई
पतंग उड़ायें छतों पे चढ़के मोहल्ले वाले
फलक तो सांझा है उसमें पेचें लड़ाए कोई
उठो कबड्डी-कबड्डी खेलें सरहदों पर
जो आये अबके तो लौटकर फिर न जाये कोई
नजर में रहते हुए जब तुम नज़र नहीं आते
ये सुर मिलाते हैं जब तुम इधर नहीं आते
नजर में रहते हो जब तुम नज़र नहीं आते
ये सुर बुलाते हैं जब तुम इधर नहीं आते

इन लकीरों को ज़मीन ही पे रहने दो
दिलों पे मत उतारो ...

1 comment:

Anonymous said...

This is so beautiful Pal.loved it.